फिल्म ‘इक्कीस’ (Ikkis) को लेकर हालिया चर्चा यह है कि फिल्म के पोस्ट-प्रोडक्शन के दौरान मेकर्स ने एक ‘बैलेंस्ड’ रुख अपनाने की कोशिश की है। विवाद इस बात पर है कि सेंसर बोर्ड के सुझावों या अंतरराष्ट्रीय वितरण (Global Distribution) को ध्यान में रखते हुए, मेकर्स ने कथित तौर पर एक ऐसा डिस्क्लेमर जोड़ा है जो पाकिस्तान के ‘नागरिकों’ और ‘सेना’ के बीच अंतर पैदा करता है। यही बात सोशल मीडिया पर उग्र राष्ट्रवाद और सिनेमाई सच्चाई के बीच बहस का कारण बनी है।
मनोरंजन डेस्क (प्राइम डेली टाइम्स): सिनेमा का पर्दा जब इतिहास की धूल झाड़ता है, तो अक्सर उससे सच की चमक ही नहीं, बल्कि विवादों की चिंगारियां भी निकलती हैं। इस समय बॉलीवुड की गलियों में एक ही फिल्म का नाम गूंज रहा है— ‘इक्कीस’। लेकिन चर्चा फिल्म के शानदार टीज़र या अगस्त्य नंदा की एक्टिंग की नहीं, बल्कि उस ‘डिस्क्लेमर’ की हो रही है जिसने दर्शकों के एक बड़े वर्ग को नाराज कर दिया है।
1971 के बसंतर युद्ध के महानायक सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन पर आधारित इस फिल्म ने रिलीज से पहले ही एक ऐसी बहस को जन्म दे दिया है, जो ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और ‘ऐतिहासिक ईमानदारी’ के बीच फंसी नजर आती है।
डिस्क्लेमर की वो लाइन, जिसने लगा दी आग
सूत्रों और सोशल मीडिया लीक्स के अनुसार, फिल्म ‘इक्कीस’ की शुरुआत में एक लंबा डिस्क्लेमर दिया गया है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि फिल्म का उद्देश्य किसी देश विशेष की भावनाओं को आहत करना नहीं है और यह केवल ‘शांति के संदेश’ को बढ़ावा देने के लिए है।
अब सोशल मीडिया पर सवाल यह उठ रहा है कि जिस युद्ध में पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया था और जहाँ हमारे वीरों ने अपने लहू से जमीन सींची थी, वहाँ ‘एंटी-पाकिस्तान’ न दिखने की इतनी कोशिश क्यों? इंटरनेट पर यूजर्स इसे ‘बॉलीवुडिया डिप्लोमेसी’ करार दे रहे हैं। लोगों का तर्क है कि जब आप युद्ध की फिल्म बना रहे हैं, तो उसे ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ बनाने की कोशिश क्यों की जा रही है?
‘एक्स’ (Twitter) पर फूटा गुस्सा: वायरल रिएक्शंस
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इस समय #Ikkis और #ArunKhetarpal ट्रेंड कर रहा है। लोग अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं
श्रीराम राघवन का ‘ग्रे-शेड’ और दर्शकों की उम्मीद
श्रीराम राघवन कभी भी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्में नहीं बनाते। ‘अंधाधुन’ से लेकर ‘बदलापुर’ तक, उनका स्टाइल किरदारों की जटिलता को दिखाना रहा है। मुमकिन है कि ‘इक्कीस’ में भी उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों को केवल ‘विलन’ के तौर पर न दिखाकर युद्ध की विभीषिका के रूप में दिखाया हो।
परंतु, समस्या यहाँ विजन की नहीं, बल्कि ‘डर’ की है। दर्शकों को लग रहा है कि फिल्म को ग्लोबल ओटीटी प्लेटफॉर्म्स (Netflix/Amazon) पर आसानी से बेचने के लिए या विदेशी अवॉर्ड्स की लालसा में इसे ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ बनाया जा रहा है।
क्या यह विवाद फिल्म के लिए अच्छा है?
अगर हम सिक्के के दूसरे पहलू को देखें, तो फिल्म ‘इक्कीस’ के लिए यह विवाद एक ‘ब्लेसिंग इन डिस्गाइज’ भी हो सकता है। अगस्त्य नंदा, जो अमिताभ बच्चन के नाती हैं, उनके लिए यह फिल्म एक बड़ा लिटमस टेस्ट है। इस विवाद के कारण जो लोग फिल्म के बारे में नहीं जानते थे, वे भी अब इसके बारे में सर्च कर रहे हैं।
FAQ
Ans. फिल्म ‘इक्कीस’ पर मुख्य विवाद इसके कथित ‘डिस्क्लेमर’ को लेकर है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 1971 के भारत-पाक युद्ध पर आधारित होने के बावजूद, मेकर्स ने पाकिस्तान के प्रति एक ‘सॉफ्ट’ या ‘नॉन-एग्रेसिव’ डिस्क्लेमर जोड़ा है। दर्शकों का एक वर्ग इसे युद्ध नायकों के शौर्य के साथ समझौता मान रहा है और सोशल मीडिया पर फिल्म के खिलाफ नाराजगी जाहिर कर रहा है।
Ans. फिल्म ‘इक्कीस’ में अमिताभ बच्चन के नाती, अगस्त्य नंदा मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। वे परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल का किरदार निभा रहे हैं।
Ans. इस फिल्म का निर्देशन राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक श्रीराम राघवन कर रहे हैं, जो ‘अंधाधुन’ और ‘बदलापुर’ जैसी फिल्मों के लिए प्रसिद्ध हैं।
Ans. यह फिल्म 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान हुई ऐतिहासिक ‘बसंतर की लड़ाई’ (Battle of Basantar) पर आधारित है।
Ans. यह फिल्म सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की बायोपिक है, जिन्होंने मात्र 21 साल की उम्र में 1971 के युद्ध में अद्भुत वीरता दिखाते हुए वीरगति प्राप्त की थी और उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
वीरता को प्रमाण की जरूरत नहीं
अंत में, बात घूम-फिरकर वहीं आती है कि कला को कितना स्वतंत्र होना चाहिए? ‘इक्कीस’ केवल एक फिल्म नहीं है, यह एक शहीद के प्रति सम्मान है। अगर मेकर्स ने केवल कानूनी औपचारिकताओं के लिए डिस्क्लेमर डाला है, तो शायद दर्शक इसे माफ कर दें। लेकिन अगर फिल्म के अंदर इतिहास के साथ छेड़छाड़ की गई है, तो ‘इक्कीस’ के लिए बॉक्स ऑफिस की राह कांटों भरी हो सकती है।
अरुण खेत्रपाल का नाम ही काफी है रोंगटे खड़े करने के लिए। उम्मीद है कि फिल्म अपनी रिलीज के साथ इन तमाम विवादों को पीछे छोड़ देगी और हमें वो गौरवशाली इतिहास दिखाएगी, जिसका हर भारतीय को इंतजार है।










